कार्नो इंजन की परिभाषा, चित्र, प्रकार, सिद्धांत, प्रणाली, दक्षता, उपयोग एवं आरेख | PDF Download |

 कार्नो इंजन की परिभाषा, चित्र, प्रकार, सिद्धांत, प्रणाली, दक्षता, उपयोग एवं आरेख

कार्नो इंजन क्या है ?

कार्नो इंजन की परिभाषा :-

वह इंजन जो विधुत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करता है , कार्नो इंजन कहलाता है |कार्नो इंजन वह इंजन है जिसकी अधिकतम दक्षता 100% हो सकती है।
इस इंजन में दो समतापी उत्क्रमणीय प्रकम होते है और दो ही रुद्धोष्म उत्क्रमणीय प्रक्रम होते है | कार्नो इंजन एक आदर्श ऊष्मा इंजन होता है |

कार्नो इंजन का सिद्धांत बताइए ?

कार्नो इंजन का सिद्धांत :-

कार्नो इंजन मुख्यत: दो सिद्धांत पर कार्य करता है जो निम्न प्रकार है -
प्रथम - कार्नो इंजन की दक्षता कार्यकारी पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती है |
द्वितीय - दो दिये गए तापों के मध्य कार्य करने वाला कोई भी ऊष्मा इंजन उन्हीं दो तापों के मध्य कार्य करने वाले कार्नो इंजन से अधिक दक्ष नहीं हो सकता है |
वैज्ञानिक लियोनार्ड कानार्ट ने " एक ऐसे इंजन की कल्पना की जिसमें उत्पन्न पूरी ऊष्मा का इस्तेमाल कार्य के रूप में रूपांतरित करने में किया जाए अर्थात इस इंजन में किसी भी प्रकार की ऊष्मा या ऊर्जा का कोई नुकसान ना हो , इस प्रकार के इंजन को कार्नो इंजन कहा गया |
चूँकि हम जानते है कि किसी भी युक्ति की दक्षता का 100% नहीं होती है , उसमें किसी न किसी प्रकार की ऊर्जा हानि अवश्य होती है इसलिए ही कार्नो इंजन को एक कल्पना और आदर्श ऊष्मा इंजन कहा जाता है | लेकिन यह इंजन व्यवहार में प्राप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी भी इंजन की दक्षता का मान 100% प्राप्त नहीं किया जा सकता |

कार्नो इंजन की दक्षता क्या है ?

कार्नो इंजन की दक्षता की परिभाषा :-

कार्नो इंजन के द्वारा किए गए कार्य तथा उसके द्वारा अवशोषित की गई ऊष्मा की मात्रा के अनुपात को ही कार्नो इंजन की दक्षता कहते है |

n =
W / Q

कार्नो इंजन के उपयोग :-

इस प्रकार के इंजन हमारे रेफ्रिजरेटर और A.C. में लगे रहते है |

कार्नो इंजन के कितने भाग है ?

कार्नो इंजन के भाग :-

सामान्यत: ऊष्मा इंजनों की दक्षता केवल 55% होती है | इस कारण इसकी दक्षता को बढ़ाने के लिए एक उत्कर्मणीय इंजन की कल्पना की , जिसे कार्नो इंजन कहा जाता है तथा इसके निम्न भाग है - 1. स्त्रोत 2. कार्यकारी पदार्थ 3. स्टैण्ड 4. सिंक

1. स्त्रोत :-

कार्नो इंजन के इस भाग के ताप को उच्च रखा जाता है तथा इसका तल कुचालक पदार्थ का बना होता है जबकि ऊपरी परत सुचालक पदार्थ की बनी होती है

 स्त्रोत

2. कार्यकारी पदार्थ :-

कार्यकारी पदार्थो के रूप में एक मोल आदर्श गैस लिया जाता है जैसे - उच्च ताप व दाब पर एक पिस्टन युक्त सिलेंडर में भर जाता है जिसका तल ( पेंदा ) एक सुचालक पदार्थ से बना होता है |

 कार्यकारी पदार्थ

3. स्टैंड :-

यह कुचालक पदार्थ का बना होता है तथा इस पर कार्यकारी पदार्थ को रखा जाता है |

 स्टैंड

4. सिंक :-

कार्नो इंजन के इस भाग को ताप पर रखा जाता है तथा इसका तल कुचालक पदार्थ का बना होता है जबकि इसकी ऊपरी सतह सुचालक पदार्थ की बनी होती है |

 सिंक

कार्नो इंजन का आरेख :-

कार्नो इंजन आरेख निम्न चार पदों में सम्पन्न होता है :-

(1) बिंदु A से बिंदु B तक चलने पर :-

कार्नो इंजन का आरेख
कार्नो इंजन का आरेख

इस स्थिति पर जब कार्यकारी पदार्थ स्त्रोत पर रखा जाता है तो स्त्रोत का ताप उच्च होने के कारण यह कार्यकारी पदार्थ को ऊष्मा प्रदान करता है जिसके कारण सिलेंडर में भरी गैस के आयतन में प्रसार होने लगता है जिसके कारण इसके आयतन का मान v1 से v2 हो जाता है तथा कार्यकारी पदार्थ का मान समान नहीं हो जाता है अर्थात इस स्थिति में समतापी प्रक्रम होता है |
अत: इस स्थिति में किये गए कार्य का मान -

W = 2.303 RT log10
v2 / v1
.........(1)

ऊष्मा गतिकी के प्रथम नियम से ∆Q = ∆V + ∆W चूँकि ∆T = 0
∆V = 0
समीकरण (1) से
∆Q = ∆W

Q1 = 2.303 RT log10
v2 / v1
.........(2)

(2) बिंदु B से C तक चलने पर :-

इस स्थिति में कार्यकारी पदार्थ को स्त्रोत पर उठाकर स्टैंड पर रख देते है जिसके कारण इस स्थिति में कोई ऊष्मा का आदान - प्रदान नहीं होता है क्योंकि स्टैंड कुचालक पदार्थ का बना होता है | इस कारण इस स्थिति में रुद्धोष्म प्रसार होने लगता है |
तब इस स्थिति में किए गए कार्य का मान -

W =
R / 1- Ψ
[T2 - T1] .......(3)

उष्मागतिकी के प्रथम नियम से
Q2 = 0

(3) बिंदु C से D तक चलने पर :-

इस स्थिति में कार्यकारी पदार्थ को स्टैंड पर से हटाकर सिंक पर रख दिया जाता है जिसके कारण सिंक का निम्न ताप होने से यह कार्यकारी पदार्थ का पिस्टन धीरे - धीरे दबने लगता है तथा यह जब तक होता है तब तक की दोनों का ताप समान नहीं होता जाता है |
अत: इस स्थिति में समतापी प्रक्रम में किये गए कार्य का मान -

W = 2.303 RT2 log10
v2 / v1
.......(4)

उष्मागतिकी के प्रथम नियम से
∆Q = ∆V + ∆W
चूँकि ∆T = 0
∆V = 0
समीकरण (4) से
∆Q = ∆W

∆Q = 2.303 RT2 log10
v4 / v3
..........(5)

(4) बिंदु D से A तक चलने पर :-

इस स्थिति में कार्यकारी पदार्थ को जब सिंक पर से हटाकर स्टैंड पर रखा जाता है | ऊष्मा के मान में कोई परिवर्तन नहीं होता है अर्थात इस स्थिति में रुद्धोष्म प्रक्रम होने लगता है |
अत: इस स्थिति में किए गए कार्य का मान -

W =
R / 1- Ψ
[T2 - T1] .......(6)

उष्मागतिकी के प्रथम नियम से Qu = 0 अत: किए गए सम्पूर्ण चक्र में किए गए कुल कार्य का मान - W = W1 - W2 - W3 - W4 चूँकि W2 = W4
तब W = W1 - W3

कुल कार्य W = 2.303 RT1 log10
v2 / v1
- 2.303 RT2 log10
v3 / v1

कार्नो इंजन की दक्षता :-

कार्नो इंजन के द्वारा किया गया कुल कार्य तथा अवशोषित की गई ऊष्मा के अनुपात को ही कार्नो इंजन की दक्षता कहते है | इसे 'n' से व्यक्त करते है |

n =
W / Q
..........(1)

उष्मागतिकी के प्रथम नियम से -
∆T = 0
∆V = 0
समीकरण (2) से
∆Q = ∆W
W = Q1 - Q2
समीकरण (1) से

n =
Q1 - Q2 / Q1
n = 1 -
Q2 / Q1
.........(3)

कार्नो इंजन से सम्बन्धित महत्वपूर्ण बिंदु :-

(a) कर्नोचक्र में सिंक के द्वारा कुछ ऊष्मा को हमेशा अपशिष्ट पदार्थ के रूप में बाहर निकाला जाता है इस कारण Q2 का मान कभी भी शून्य नहीं हो सकता है | Q2 ≠ 0 (b) लेकिन यदि Q2 = 0 हो तो Q2 = 0 और n = 1
तो n% = 100%
(c) कर्नोइन्जन में ऊष्मा का मान ताप के समानुपाती होता है |
अत: इस स्थिति में Q ∝ T

Q2 / Q1
=
T2 / T1

समीकरण (3) से

n = 1 -
T2 / T1

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