ऊष्मागतिकी | PDF DOWNLOAD |

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ऊष्मागतिकी :- भौतिक रसायन विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत प्रकृति में उपस्थित विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं के अन्तः संबंधों का अध्ययन किया जाता है ऊष्मागतिकी कहलाती है

ऊष्मागतिकी के घटक :-

निकाय या तंत्र ( System ) :- ब्रह्मांड का वह भाग जिसे ऊष्मागतिकी अध्ययन के लिए चुना जाता है निकाय कहलाता है c जैसे :- किसी सिलेंडर में भरी गई गैस
परिवेश ( Surrounding ) :- निकाय के अलावा ब्रह्मांड का शेष भाग , परिवेश कहलाता है
निकाय + परिवेश = ब्रह्मांड

निकाय के प्रकार :-

खुला निकाय :- वह निकाय जो परिवेश से द्रव्य एवं ऊष्मा का आदान-प्रदान करता हो , खुला निकाय कहलाता है
जैसे :- कप में रखी चाय
बंद निकाय :- वह निकाय जो ऊष्मा का आदान प्रदान करता है परंतु द्रव्य का नहीं बंद निकाय कहलाता है
जैसे :- कुकर में सब्जी का पकना
विलगित निकाय :- वह निकाय जो परिवेश से ऊष्मा एवं द्रव्य का आदान प्रदान नहीं करता , विलगित निकाय कहलाता है
जैसे :- थरमश में रखी चाय

ऊष्मागतिकी के प्रक्रम :-

किसी निकाय में होने वाला प्रावस्था परिवर्तन , ऊष्मागतिकी प्रक्रम है
1. समतापीय प्रक्रम :- किसी निकाय में स्थिर ताप पर होने वाला परिवर्तन समतापीय प्रक्रम कहलाता है
अर्थात dt = 0 and ΔT = 0
2. समदाबी प्रक्रम :- किसी निकाय में स्थिर दाब पर होने वाला परिवर्तन समदाबी प्रक्रम कहलाता है
अर्थात ΔP = 0
3. समआयतनी प्रक्रम :- किसी निकाय में स्थिर आयतन पर होने वाला परिवर्तन समआयतनी प्रक्रम कहलाता है
अर्थात Δv = 0
4. रुद्धोष्म प्रक्रम :- किसी निकाय में होने वाला वह प्रक्रम जो ऊष्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता है अर्थात ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता है
अर्थात Δv = 0
5. चक्रीय प्रक्रम :- वह प्रक्रम जिसमें किसी निकाय के प्रारंभिक प्रावस्था से अंतिम प्रावस्था तक ऊर्जा स्ठिर रहती है चक्रीय प्रक्रम कहते हैं

ऊष्मागतिकी के गुणधर्म :-

विस्तीर्ण या मात्रात्मक गुणधर्म :- किसी निकाय के वह गुणधर्म जो पदार्थ की मात्रा पर निर्भर करते हैं ना कि प्रकृति पर विस्तीर्ण या मात्रात्मक गुणधर्म कहलाते हैं
उदाहरण :- द्रव्यमान , आयतन , एंथैल्पी , एंट्रॉपी ऊष्माधारिता इत्यादि
गहन या मात्रा स्वतंत्र गुणधर्म :- किसी निकाय के वे गुणधर्म जो पदार्थ की मात्रा पर नहीं बल्कि प्रकृति पर निर्भर करते हैं गहन गुणधर्म कहलाते हैं
उदाहरण :- ताप , दाब , पृष्ठ तनाव , विष्काषिता इत्यादि

कार्य

किसी निकाय की आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन को कार्य के रूप में परिभाषित किया गया है
किसी निकाय द्वारा ऊर्जा को ऊष्मा के रूप में ग्रहण करने या त्यागने पर निकाय की आंतरिक ऊर्जा में कमि या वृद्धि होती है

अतः कार्य दो प्रकार से होते हैं
किसी निकाय पर किया गया संकुचन कार्य W = Pdv
किसी निकाय द्वारा किया गया प्रसार कार्य W = -Pdv

ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम :- इसे ऊर्जा संरक्षण का नियम भी कहते हैं इस नियम के अनुसार ऊर्जा का ना तो उत्पन्न किया जा सकता है एवं ना ही नष्ट किया जा सकता है ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरित होती रहती है इसे ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम कहते हैं
एक ऐसी गतिशील शाश्वत मशीन बनाना असंभव है जो बिना ऊर्जा व्यय किए कार्य में परिवर्तित कर दे
ब्रह्मांड की कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है

ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम का गणितीय समीकरण :- किसी निकाय की आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि निकाय पर कार्य करके या ऊर्जा को उसका के रूप में देकर की जाती है
माना किसी निकाय की प्रारंभिक आंतरिक उर्जा U1 है तथा निकाय द्वारा q ऊष्मा अवशोषित कर आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि U1 + q हो जाती है तथा निकाय पर W कार्य किया जाता है तो अंतिम अवस्था में निकाय की आंतरिक ऊर्जा U2 के बराबर हो जाती है
तो आंतरिक ऊर्जा परिवर्तन :-
U2 = U1 + q + W
U2 - U1 = q + W
ΔU = q + W
q = ΔU - W
किसी निकाय द्वारा प्रसार कार्य किया जाता है तो आंतरिक ऊर्जा -
ΔU = q - Pdv
q = ΔU + Pdv
किसी निकाय पर संकुचन कार्य किया जाता है तो आंतरिक ऊर्जा परिवर्तन -
ΔU = q + Pdv
q = ΔU - Pdv

एंथैल्पी ( Enthalpy ) :- किसी निकाय की आंतरिक ऊर्जा एवं दाब , आयतन के गुणनफल के योग को एंथैल्पी कहते हैं
अर्थात H = U + Pv
जहाँ H = एंथैल्पी
U = आंतरिक ऊर्जा
P = दाब
V = आयतन
जब धनात्मक हो तो
Hp > H r
जब ऋणात्मक हो तो
Hr > H p
ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया में
ΔH = ऋणात्मक
ऊष्माशोषी अभिक्रिया में
ΔH = धनात्मक
एंथैल्पी परिवर्तन समीकरण :-
माना एक सामान्य अभिक्रिया -
A → B
अभिक्रिया के एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन होने पर एंथैल्पी में परिवर्तन होता है -
अतः प्रारंभिक प्रावस्था में एंथैल्पी -
HA = UA PVA
अंतिम प्रावस्था में
HB = UB PVB
एंथैल्पी परिवर्तन
HB - HA = UB PVB - U A PVA
ΔH =( UB - UA ) + ( PVB - PVA )
ΔH = ΔU + PΔV

विभिन्न प्रकार की एंथैल्पियां :-

विरचन एंथैल्पी :- एक मोल यौगिक के उसके अवयवी कणो द्वारा बनने में ऊर्जा में जो परिवर्तन होता है उसे विरचन एंथैल्पी कहते हैं
Ex :- C + 2 H 2 → CH4 ( ΔH = ऋणात्मक एंथैल्पी )
C + O 2 → CO2 ( ΔH = ऋणात्मक एंथैल्पी )

दहन एंथैल्पी :- किसी यौगिक के एक मोल को वायु में जलाने पर एंथैल्पी में जो परिवर्तन होता है उसे दहन एंथैल्पी कहते हैं
Ex :-
CH4 + 2O2 → CO2 + 2H2O ( ΔH = ऋणात्मक KJmol-1 )
CH4 + 132 O2 → 4CO2 + 5H2O ( ΔH = - KJmol-1 )

जलयोजन एंथैल्पी :- किसी लवण या यौगिक के एक मोल को जल में घोलने पर एंथैल्पी परिवर्तन को जलयोजन एंथैल्पी कहते हैं
Ex :- NaCl + aq → NaCl Aq ( ΔH = + )
NaCo3 → Na2Co3 Aq ( ΔH = - )
अवस्था परिवर्तन एंथैल्पी :- यह दो प्रकार की होती है
गलन एंथैल्पी :- किसी यौगिक के एक मोल ठोस को उसके गलनांक बिंदु पर द्रव में परिवर्तन होने पर एंथैल्पी में जो परिवर्तन होता है उसे गलन एंथैल्पी कहते हैं
बर्फ → जल ( ΔH = + KJmol-1 )
वाष्पन एंथैल्पी :- एक मोल द्रव के उसके क्वथनांक बिंदु पर वाष्प में परिवर्तित होता है तो उसमें एंथैल्पी परिवर्तन को वाष्पन एंथैल्पी कहते हैं
जल → वाष्प ( ΔH = + KJmol-1 )
ऊष्मा धारिता जब किसी निकाय द्वारा ऊर्जा को ऊष्मा के रूप में अवशोषित किया जाता है तो ताप में वृद्धि हो जाती है अतः ताप में यह वृद्धि ऊर्जा के समानुपाती होती है
अर्थात q ∝ ΔT
q = CΔT
C = q / Δ
जहां C1 एक स्थिरांक है जिसे ऊष्मा धारिता स्थिरांक कहते हैं
C की इकाई = JK-1या J degree-1
गैसों के लिए ऊष्मा धारिता स्थिर आयतन एवं स्थित दाब पर
स्थिर आयतन पर ऊष्माधारिता :- स्थिर आयतन पर एक मोल गैस का 1 डिग्री बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा को स्थिर आयतन पर ऊष्माधारिता कहते हैं
अर्थात
qv = CvΔT
या
Cv = qv / ΔT
स्थिर आयतन पर दी जाने वाली ऊर्जा उसकी आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि के बराबर होती है
अर्थात qv = Δ U

स्थित दाब पर ऊष्माधारिता :- स्थित दाब पर एक मोल गैस का 1 डिग्री ताप बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा , उसकी स्थिर दाब पर ऊष्माधारिता कहलाती है
अर्थात
qp = CpΔT
या
Cp = qp / ΔT
स्थिर दाब पर ताप में वृद्धि उस निकाय के एंथैल्पी में वृद्धि के बराबर होती है
अर्थात
qp = Δ H
या
Cp = Δ H / ΔT

आदर्श गैसों के लिए Cp एवं Cv में संबंध :-

स्थिर आयतन पर ऊष्मा -
qv = Cv ΔT = Δ U
स्थिर दाब पर ऊष्मा विनिमय -
qp = Cp ΔT = Δ H
एंथैल्पी परिवर्तन समीकरण से
PV = RT
तब Δ H = Δ U + R Δ T
Cp ΔT = Cv ΔT + R ΔT
Cp = Cv + R
R = Cp - Cv

यह मेयर समीकरण हैं

हैंस का नियम :- इस नियम के अनुसार किसी रासायनिक अभिक्रिया को एक या एक से अधिक प्रक्रमों द्वारा संपन्न कराया जाता है तो दोनों की प्रक्रमों में कुल ऊर्जा का विनिमय समान होता है इसे हैंस का नियम कहते हैं
जैसे
अनुप्रयोग :- आयनिक लवणों की ज्यादा ऊर्जा की गणना करता है
जालक ऊर्जा दाब पर :- विपरीत आवेशित आयनों के संयोजन द्वारा एक मोल आयनिक क्रिस्टल के बनने पर निष्कासित ऊर्जा को जालक ऊर्जा कहते हैं
M + + X --U जालक M + X -
जालक ऊर्जा का निर्धारण :- इसका निर्धारण बार्न हैबर चक्र द्वारा किया जाता है यह हैंस के नियम पर आधारित है
इसमें निम्न घटनाएं घटित होती है -
1. सर्वप्रथम तत्वों को गैसीय आवरण में परिवर्तित किया जाता है
2. गैसीय परमाणु आवेशित हो जाते हैं
3. आवेशित आयन संयोग करके क्रिस्टल जालक का निर्माण करते हैं

प्रत्यक्ष प्रक्रम
Δr H = KJmol-1
अप्रत्यक्ष प्रक्रम
Δr H = Δs H + ΔIE H + ΔD H - ΔEA H - U
एंट्रोपी एवं स्वत: प्रवतिता :- एंट्रोपी किसी निकाय की अव्यवस्था की माप होती है अत: अव्यवस्था बढ़ने पर एंट्रोपी बढ़ती है एवं अभिक्रिया अग्र दिशा में विस्थापित हो जाती है इसे S द्वारा दर्शाते हैं यह एक अवस्था फलन है ये निकाय की प्रथम एवं अंतिम अवस्था पर निर्भर करती है
ΔS = S2 - S1
प्रकृति में प्रक्रम स्वत: होते हैं जिनकी एंट्रोपी अधिक होती है
स्वत: प्रवतिता प्रक्रम अनुत्क्रमणीय होते हैं
सभी उत्क्रमणीय प्रक्रम की एंट्रोपी अधिक होती है
ब्रह्मांड की कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है एंट्रोपी धनात्मक रहती है यह "क्लासियस" का प्रथम एवं द्वितीय नियम के लिए संयुक्त कथन है
ΔSकुल = ΔSनिकाय + ΔSपरिवेश > 0
अत: एंट्रोपी ΔS = q / ΔT
इकाई :- 1. जूल केल्विन -1
2. कैलोरी डिग्री -1
3. JK -1 mol-1

गिब्ज ऊर्जा :- स्थिर ताप एवं दाब की परिस्थितियों में किसी निकाय में होने वाले परिवर्तन परिवर्तन के दौरान मुक्त ऊर्जा जो उपयोगी कार्य में प्रयुक्त होती है गिब्ज या मुक्त ऊर्जा कहलाती है इसे "G" से दर्शाया जाता है यह एक अवस्था फलन है
CT H - TS
जहां H = एंथैल्पी
T = ताप
S = एंट्रोपी

गिब्ज ऊर्जा परिवर्तन :- स्थिर ताप पर निकाय की प्रारंभिक अवस्था से अंतिम अवस्था में परिवर्तन होने पर मुक्त ऊर्जा परिवर्तन
प्रारंभिक अवस्था में गिब्ज ऊर्जा
CT1 H - TS1
अंतिम अवस्था मेंगिब्ज ऊर्जा
CT2 H - TS2
अतःगिब्ज ऊर्जा परिवर्तन

गिब्ज ऊर्जा परिवर्तन एवं स्वत:प्रवतिता की कसौटी :- ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम से या एंट्रॉपी परिवर्तन समीकरण से-
ΔSकुल = ΔSनिकाय + ΔSपरिवेश
स्थिर ताप एवं दाब की परिस्थितियों में परिवेश द्वारा निकाय को ऊष्मा दी जाती है तो यह एंथैल्पी परिवर्तन के तुल्य होती है -
अर्थात
ΔSपरिवेश = -qp / ΔT = -ΔH / ΔT
ΔSकुल = ΔSनिकाय - ΔH / ΔT
दोनों पक्षों में T से गुणा करने पर
TΔSकुल = T ΔSनिकाय - ΔH
- TΔSकुल = ΔH - T ΔSनिकाय
- TΔSकुल = ΔG

गिब्ज ऊर्जा परिवर्तन प्रदर्शित करता है जब -
1. 0 > ΔG अर्थात गिब्ज ऊर्जा ऋण आत्मक होती है तो अभिक्रिया अग्र दिशा में विस्थापित होगी एवं प्रक्रम स्वत: परिवर्तित होगा
जब ΔG = 0 तो अभिक्रिया साम्य अवस्था में होगी
जब ΔG > 0 तो प्रक्रम अस्वत: होगा
मानक गिब्ज ऊर्जा :- 298 केल्विन ताप एवं एक वायुमंडलीय दाब ( 1 atm ) पर उत्पन्न मुक्त गिब्ज ऊर्जा को मानक गिब्ज ऊर्जा कहते हैं
मानक गिब्ज ऊर्जा एवं साम्य स्थिरांक में संबंध :- माना किसी निकाय में परिवर्तन होता है तो मुक्त गिब्ज ऊर्जा को निम्न समीकरण से दर्शाते हैं
ΔG = ΔG + RT ln Q
यदि अभिक्रिया गैसीय साम्य अवस्था में है तो गिब्ज ऊर्जा परिवर्तन 0 प्राप्त होती है
अर्थात 0 = ΔG + RT ln Kc
ΔG = - RT ln Kc
{ Q = Kc }
{ ln = 2.303 log10 }
log लेने पर
ΔG = -2.303 RT ln Kc


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